Saturday, June 7, 2008

समय का पंचनामा

हर जगह से दो मिनट का फासिला है अब मेरा
मैं समय का पंचनामा कर रहा हूँ आजकल
आठ चालीस की पकड़ता हूँ मैं लोकल हर सुबह
पौने नौ से नौ बजे तक वेट करता हूँ तेरा
इस समय मैं ट्रेन मैं हूँ
फ़ोन कर लो तुम मुझे...
बाद इसके एक टेबल पर निकल जायेगा वक्त
काटता रहता हूँ अक्सर मैं कलाई पर जिसे...
दिन गुजर जाने की मोहलत मिल गयी है शाम तक
शाम की तैयारियों में दिन गुजरता है मेरा
रात के ठंडे बदन में शाम ढलती है मेरी
छः बजे फिर नेट पर मैं वेट करता हूँ तेरा
इस तरह से दर्द शेयर कर रहे हैं हम सभी
साधे ग्यारह से शुरू होती है दुनिया ख्वाब की
saadhe दस तक वाय्दूं की धाज्जियाँ सब उड़ गयीं
जो मिला मैं एक घंटे में निगल कर सो गया
एक दिन का वक्त मेरा इस तरह गुम हो गया.

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